महेक की जुबानी: कैरी का अचार,एक महिला की अनकही कहानी

डॉ. मयूर जोशी

आज महेक मिर्ज़ा प्रभु की छोटी सी कहानी कैरी का अचार का वीडियो देखते देखते मनमें कई सारी कहानियाँ आयने की तरह घूमने लगी है | सिर्फ ३ मिनिट और ३५ सेकंड चलने वाले ईस वीडियोने कई महिला की कहानी मेरे जेहनमें आ गई| एकदम सरलता से कही गई कहानी स्त्री के जीवन के सत्य को उजागर करता है|

उदगम ट्रस्टने २०१० में आंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्यमें पहली बार गांधीनगरमें महिलाओ को सम्मानित करने की शरू किया और ९ साल के ईस सफर में अब तक २१० महिलाओको सम्मानित किया पर शायद ५०० से ज्यादा महिलाओ के संघर्ष की कहानी पता चली| हर वर्ष एवॉर्डी महिला की संघर्ष की कहानी सुन कर आँखे भर जाती है| सिर्फ नारी को सम्मान देने की बात से आज उनके संघर्ष को मंच अदभुत लगता है|

कैरी का अचार की कहानी की तरह महिला अपना मायका छोड़ कर ससुराल आती है तब उसी तरह अपने आप को ढलते हुए अपने निजी जीवनमें भोत बदलाव करती है| उन्हें इतनी फुर्सत ही नहीं मिल पाती कि वे अपने लिए कुछ सोच पाये। केरी के आकर और कलर अनुसार जब भी हम कोई लड़की शादी के लिए ढूंढते है तब रंग-रूप, परिवार अच्छा होना चाहिए, जिस पर दाग न लगा हो, गुणी होनी चाहिए, वगरैह, वगरैह| कहानी सुन कर लगता है की क्या आज भी हम वही सदियों पुराणी परमपरा में जीवित है|

कहानी सुनते सुनते कुछ समय पहली एक उच्च पद पर आसीन अधिकारी की पत्नी का वाक्य याद आ गया, जो हर बार मेरे पास आकर अपनी घुटन की कहानी सूना कर रोती थी| मेरे सुझाव पर आज वो अपना मनचाहा काम और भरतनाट्यम शिख रही है | पहले खुद बच्ची, फिर शादी, फिर बच्चे, उनकी पढ़ाई, उनका करियर आदि-आदि। मुझे लगता है की सामाजिक व्यवस्था ने औरत को परतंत्र बना दिया है| हम समाजवयवस्था को बदल नहीं सकते पर ज़िन्दगी के एक हिस्से को मुक्त कर दें। उसे उस हिस्से से जुड़े निर्णय स्वयं लेने दें शायद कैरी का अचार बनाने से मुक्ति मिल जाए|

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